रविवार, 12 अप्रैल 2009

मीडिया पर मंदी की भरी मार है..सभी मीडिया संस्थानों से लोगों की छटनी की जा रही है.चाहे वह प्रिंट मीडिया हो या एलेक्टोनिक मीडिया.मंदी के नाम पर जन्हा लोगों की छटनी की जा रही है वन्ही कोस्ट कटिंग के नाम पर लोगों की सलारी में भी भरी कटौती की जा रही है.काम के घंटे बढाये जा रहे हैं.छूती कम की जा रही है।
मैं इस बात को किसी भी तरह से नही समझ पा रहा हूँ की मीडिया पर मंदी कैसे असर डाल रही है.मीडिया के आर्थिक श्रोत देखें जाए तो उनमे किसी भी तरह की कमी नही दिखती .चुनाव के दौरान सभी मीडिया संस्थानों की कमाई बढ़ ही गई है.फ़िर भी अगर कहा जाय की विज्ञापन कम हो गए हैं तो कोई मुझे ये बताने का कस्ट करेगा कि किस चैनल पर विज्ञापन कम हो गए हैं.किस अखबार के पन्ने विज्ञापन के अभाव से ग्रस्त हो गए हैं.

शुक्रवार, 28 नवंबर 2008


मुंबई में आतंक और मीडिया का नाटक

मुंबई पर आतंकी हमले के बाद हमें निम्न बिन्दुओ पर विचार करने की जरुरत है........

१-मीडिया आतंकियो के साथ थी या देश के साथ ?

२- मीडिया ने भय ,आतंक , कमांडो कारवाई और बिखरी लाशों से टीआरपी बढ़ा कर कितनी कमाई की ?

३-देश की बड़ी एजेंसी एटी एस के चीफ का इतनी आसानी से आतंकियों का शिकार हो जाना कैमरे के सामने अति आत्मविश्वास का परिणाम था या बहादुरी ?
४-आतंकियो का यह दुस्साहस क्या यह नही दर्शाता की पूरा देश उनकी गिरफ्त में है ?